गुरुवार, 22 जुलाई 2010

समय की कसौटी

समय की कसौटी
जब लेती है
परीक्षा
कहाँ खड़ा हो पाया कोई
इतिहास में

हारे हैं
सिपाही अपने ही वार से
और
कई युद्ध नहीं हुए हैं
मैदान में
समय के चक्र में
अनायास और अचानक ही
हुए हैं घायल
प्रारब्ध और नियति
समय से कहाँ
होड़ ले पाया कोई
इतिहास में

लेकिन
समय का अपना गणित है
अपनी व्याख्या है
आमतौर पर
कहते हैं उसे
समझौता
और लोगों को स्वीकार्य हैं
समझौते

समय के वितान पर
ए़क याचक हूँ मैं
तुम्हारे कुछ पलों का
जिन्हें बंद कर लेना चाहता हूँ
अपनी आँखों में
अपने ह्रदय में
और
अमिट कर देना चाहता हूँ
तुम्हे
हर समय से परे
प्रारब्ध और नियति की पहुँच से
बहुत बहुत दूर
नए समय में

12 टिप्‍पणियां:

  1. समय की कसौटी
    जब लेती है
    परीक्षा
    कहाँ खड़ा हो पाया कोई
    इतिहास में .......
    ............
    समय की कसौटी पर वे खड़े होते हैं
    जिनमें आग होती है
    सत्य का तेज प्रोज्ज्वलित होता है
    और वे जीतते हैं ...

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  2. arun jee
    namaskar !
    samay ne kabhi kisi ko nahi kahsha swayam ishwar ko bhi phir aadami ki kya bisat hai . samay hi apne saath hume chalne ko vivash karta hai .ek sunder abhivyakti ke liye badhai
    sadhuwad.

    narendera vyas

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  3. अले वाह, कित्ती प्यारी कविता....अच्छी लगी.
    ***********************

    'पाखी की दुनिया' में आपका स्वागत है.

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  4. अभिव्यक्ति का यह अंदाज निराला है. आनंद आया पढ़कर.

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  5. समय के सामने कौन टिका है, अन्ततः सब निढाल हैं।

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  6. जब लेती है परीक्षा कहाँ खड़ा हो पाया कोई!

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  7. समय के चक्र में
    अनायास और अचानक ही
    हुए हैं घायल
    प्रारब्ध और नियति
    bahut khoob kaha aapne ,samay se bane samay ke chakra me fanse sahi samay ki bat johate hai ye bhi.....

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  8. आमतौर पर
    कहते हैं उसे
    समझौता
    और लोगों को स्वीकार्य हैं
    समझौते
    समझौते गर स्वीकार्य न होते तो क्यूँ अस्तित्व की सम्भावना पर ही प्रश्न खड़ा होता !!

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