सोमवार, 26 जुलाई 2010

कील पर टँगी बाबूजी की कमीज़

आज
बहुत याद आ रही है
कील पर टंगी
बाबूजी की कमीज़

शर्ट की जेब
होती थी भारी
सारा भार सहती थी
कील अकेले

होती थी
राशन की सूची
जिसे बाबूजी
हफ्तों टाल मटोल करते रहते थे
माँ के चीखने चिल्लाने के बाद भी
तरह तरह के बहाने बनाया करते थे बाबूजी
फिर इधर उधर से पैसों का जुगाड़ होने के बाद
आता था राशन
कील गवाह थी
उन सारे बहानो का
बहानो का भार जो बाबूजी के दिल पर पड़ता था
उसकी भी गवाह थी
कील

बाबूजी के जेब में
होती थी
दादा जी की चिट्ठी
चिट्ठी में दुआओं के साथ
उनकी जरूरतों का लेखा जोखा
जिन्हें कभी पूरा कर पाते थे बाबूजी
कभी नहीं भी
कील सब जानती थी

कील
उस दिन बहुत
खुश थी
जब बाबूजी की जेब में था
मेरे परीक्षा-परिणाम की कतरन
जिसे सबके सोने के बाद
गर्व से दिखाया था उन्होंने
माँ को
नींद से जगा कर

कील उस दिन भी
खुश थी
जिस दिन बाबूजी ने
बांची थी मेरी पहली कविता
माँ को
फिर से नींद से जगा कर

बाबूजी की जेब में
जब होती थी
डॉक्टर की पर्ची
जांच की रिपोर्ट
उदास हो जाती थी
कील
माँ से पहले

ठुकने के बाद
सबसे ज्यादा खुश थी
कील
जब बाबूजी लाये थे
शायद पहली बार
माँ के लिए बिछुवे
अपनी आखिरी तनख्वाह से

आज
बाबूजी नहीं हैं
उनकी कमीज़ भी नहीं है
लेकिन कील है
अब भी
माँ के दिल में
चुभी हुई
हमारे दिल में भी ।

26 टिप्‍पणियां:

  1. नि:शब्द..... कुछ भी कहने लायक नहीं..बस महसूस करने लायक अभिव्यक्ति...

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  2. भावुक करती रचना, बहुत उम्दा!!

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  3. कील गवाह थी
    उन सारे बहानों की ।

    बहानों का भार जो बाबूजी के दिल पर पड़ता था
    उसकी भी गवाह थी
    कील


    बहुत मर्मस्पर्शी !

    अरुण जी
    मैं पहले भी कह चुका हूं कि आप बहुत अच्छे प्रयास कर रहे हैं , मुक्तछंद की रचनाओं में …

    मेरी शुभकामनाएं स्वीकार करें

    - राजेन्द्र स्वर्णकार
    शस्वरं

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  4. आज
    बाबूजी नहीं हैं
    उनकी शर्ट भी नहीं है
    लेकिन कील है
    कील के माध्यम से आपने तो कील गाड़ दिया
    बेहतरीन मर्मस्पर्शी रचना

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  5. बेहतरीन भावा अभिव्यक्ति कील के माध्यम से

    आभार अरुण जी

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  6. संवेदना के अंतरंग भावों को छू गयी आपकी यह भावमयी प्रस्तुति।

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  7. aaj rulaa hee diyaa aapne...man se nikli kavitaa aisaa he asar rakhti hai

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  8. अरुण जी आपकी रचनाएँ ह्रदयस्पर्शी होती हैं उसी का सबूत है यह बेमिशाल रचना - तारीफ़ का हर शब्द छोटा लगेगा आपकी इस शानदार रचना के लिए.

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  9. हे भगवान !!!!!!!!! क्या लिख डाला आज तो. बेजुबान हो गयी हूँ. वाह री किस्मत कील की और कील की चुभन महसूस करने वाले मन की

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  10. कील गवाह थी
    उन सारे बहानो का
    बहानो का भार जो बाबूजी के दिल पर पड़ता था
    उसकी भी गवाह थी
    कील--keel ke madhyam se jeevan ke aik paksh ka marmik chitran.

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  11. आपकी यह प्रस्तुति कल २८-७-२०१० बुधवार को चर्चा मंच पर है....आपके सुझावों का इंतज़ार रहेगा ..


    http://charchamanch.blogspot.com/

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  12. निशब्द हूँ………………अत्यंत मार्मिक्।

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  13. बहुत मर्मस्पर्शी !
    शब्दों का अकाल है अभी कल के जैस एशब्द भी नहीं ..बस गाड़ी होने का अहसास है और शब्दों का एक अहसास यहाँ है

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  14. Zindgi ki kuch dhuul padi yaado se mano apne avaran hata diya jo dil ke kisi kone mai dabi thee ek dashak se. Maine apne babu ji ko ek arse pehle khoya tha, par aaj unki yaar aur ghar ke ek koneey par tangi shirt yaad aa gayi.. jisme hamare ghar ke liye dekhe kai sapno ka lekha jhokha hua karta tha...

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  15. bhavana pradhan rachna........

    ye bhi padiye-

    http://anaugustborn.blogspot.com/2010/06/happy-fathers-day.html

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  16. बहुत ही संवेदनशील कविता है. आँखें नाम कर गई.... !!

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  17. अधिक कहना व्यर्थ है ..बस इतना कहूँगा बहुत ही मर्मस्पर्शी और दिल को छू लेने वाली रचना है
    जितना गाओ घिंसता जाये जीवन का धुंधला संगीत।

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  18. कविता शब्द संयोजन नहीं , बल्कि जीवन की अनुभुतिया हैं .एक कील कैसे बन जाती है भावनाओं का केंद्र - बहुत श्रेष्ठ कविता .

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  19. पिता पर कम कविताएं लिखी गई हैं, ये उनमें से बेहतरीन है...

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