सोमवार, 3 अगस्त 2026

काकी की चिंता

 फोन आया है काकी का गांव से 

इस बार अषाढ नहीं बरसा 

खेत सब उपटे पडे हैं 

इस बार आम भी नहीं फले थे 

बिना खाद पानी के 


काकी बता रही थी 

इनार तो भर ही गया था 

अब चापाकल भी छोड दिया है 

पानी , सूख गया है . 


हर घर 'नल से जल' वाला नल लग तो गया है 

लेकिन पानी कब आयेगा नहीं पता 

अभी तो गांव में टंकी भी नहीं बना है 


मेरे साथ बचपन में जो लड्का  

करता था नाटक, वह बऔरा गया है 

पंचायत समिति का शिकायत कर दिया था 

कहीं ऊपर और जांच बैठ गई 

उसी समय कोई दारु में कुछ मिला के 

पिला  दिया उसको, कहते हैं लोग 

काकी को नहीं पता है इसका पूरा सच 

हाँ ये जरूर कह्ती है कि 

मुखिया, काउंसिलर, पंचायत समिति का आदमी सब 

चलने लगा है बलेरो से ! 


काकी कहती है 

गांव में घर होना जरुरी है 

साल में दू बार गांव आना जरुरी है 

नहीं तो हो जाते हैं  देवता पितर नाराज 

और कहती हैं देना है पातैर (प्रसाद) 

नये अन्न के आने पर 

लेकिन अभी तक खेत रोपा नहीं गया 

बरखा नहीं हई आषाढ में ! 


‌‌‌‌ 


अमेरिकी कवियत्री मरवा हेहाल की कविता "नदी" का अनुवाद

 [नदी]


मरवा हेलाल

-----------------------------

नदी                    खून

शाखाएँ                पेड़

खून                    बत्तख

तेल                    हंस

समुद्र                 लालच

संक्षिप्त 

विराम

हुक्म

जिसके पास चाबी थी

दुख ने पेड़ को जड़विहीन कर  दिया

ताकि सत्ता  कभी

आजादी को न कर सके मुक्त !

मंगलवार, 28 जुलाई 2026

सृजन

1. 


भीतर 

कुछ चल रहा हो 

और आपको समझ में नहीं आये

तो समझिये आप हैं 

सृजन की प्रक्रिया में. 


2. 

सृजन के लिये 

कई बार निर्माण भी होता है

जब गढी जाती है नई मूर्ति 

विध्वंस के बाद 




बुधवार, 15 जुलाई 2026

सितम्बर की भूख



(निकोल सेसिलिया डेलगाडो  की स्पेनिश कविता सेप्टिहैम्ब्रे
स्पैनिश से  अंग्रेजी अनुवाद: कैरिना डेल वैले शोर्स्के )

अगस्त और समुद्र में नौकायन के मौसम के बीच
मेरे शहर  में सब कुछ जैसे ठहर-सा जाता है
ज़्यादातर दुकानें बंद हो जाती हैं
और रोक लगी होती है मछली, केकड़े और शंख पकड़ने पर।  

मछुआरे रविवार का समय 
खुले समुद्र तट पर
कराओके साल्सा के पुराने गाने गाकर बिताते हैं,
उनकी आवाज़ में असर झलकता है
खारे पानी और हालात से समझौता करने का ।

समुद्री घास  को आराम मिलता है,
 वह फिर से पनपती है
समुद्र की तलहटी किसी नियॉन रोशनी वाली दावत जैसी लगती है।
एल्कहॉर्न कोरल खिल उठते हैं, 
कछुए धीरे धीरे आ जाते हैं किनारों के पास।  

लेकिन समुद्र तट पर ख़लती  है  
लोगों को कमी ।

अच्छी बात यह है कि
फलों के पेड़ खूब फलते-फूलते हैं।
स्थानीय लोग केले, ब्रेडफ्रूट और हरे केले का 
लेन-देन करते हैं।
इस बीच बहुत अच्छी हुई इस साल एवोकैडो की फ़सल 
और आ सकता है कभी भी तूफ़ान ।

अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद : अरुण चंद्र राय

बुधवार, 8 जुलाई 2026

बर्फ़ीले तूफ़ान के बीच स्वादिष्ट व्यंजन बनाते हुए कुछ विचार

 बर्फ़ीले तूफ़ान के बीच स्वादिष्ट व्यंजन बनाते हुए कुछ विचार


येसेनिया मोंटिला



मैं अपने जीवन शानदार चीज़ों से घिरी रहना चाहती हूँ, 
किन्तु सुंदरता तो पूँजीवाद है
यानी मुझे चीज़ों से प्यार करना 
'खरीदने की क्षमता' के ज़रिए सिखाया गया था,
और अब मैं एक ऐसे देश में हूँ 
जहाँ ज़िंदगी बस दिखावा और गुलाब है, 
रोटी कभी नहीं।

मैं एक पूरे गाँव का पेट कैसे भरूँ 
जब मेरी एकमात्र काबिलियत 
अपने लिए शानदार और सूंदर चीज़ें जमा करना है, 
न कि उन्हें बाँटना? 
हे भगवान, मैं कितनी गलत थी कि 
मैंने हथियारों के बजाय कपड़े 
और खेती के बजाय कविता की किताबें चाहीं। 

मेरा प्रेमी अपने बगीचे से 
मुझे काजू और बादाम भेजता है
और मैं उन्हें गौर से देखती हूँ, 
यह सोचकर कि धरती की कोख से 
फसल उगाने का एहसास कैसा होता होगा
मिट्टी में सने मेरे हाथ 
रस्सी बनकर 'अच्छाई' को खींचते हैं 
और माफ़ी माँगते हैं धरती से ।

 वे हमें मार रहे हैं और 
हम सब बस ऑफिस जा रहे हैं,
 टीवी देख रहे हैं 
बाहर से खाना मँगवा रहे हैं
कई बार लगता है कि  
मुझे तो विरोध करना चाहिए था।

मौतें बर्फ़ की तरह जमा होती जाएँगी 
और हम सबको क्रांति के लिए अपनी जान देनी पड़ेगी। 
मैं थक गई हूँ यह सुनकर कि 
यह सब पेचीदा है, जटिल है
और आज संभव नहीं है।  

वे कहते हैं कि इसका सम्बन्ध पैसे और ताकत से है, 
लेकिन वे हमसे चाहते हैं कि हम भुला दें कि  
हम प्यार कैसे करते हैं
प्यार किससे करते हैं
और प्यार क्यों करते हैं ।  

बर्फीले तूफ़ान के बीच 
वे चाहते हैं कि 
हम घर के अंदर रहकर
अच्छे अच्छे व्यंजन बनायें 
और बाहर चाहे लोग गोली से मरते रहें
हम चुप रहें ! 

(अनुवाद : अरुण चंद्र राय ) 

येसेनिया मोंटिला एक एफ्रो-लैटिना कवयित्री, शिक्षिका, संपादक और अनुवादक हैं। उन्होंने ड्रू यूनिवर्सिटी से कविता और कविता-अनुवाद में एमएफए की डिग्री हासिल की है। वे न्यूयॉर्क में रहती हैं।  

बुधवार, 29 अप्रैल 2026

सभ्यता को नष्ट करने की जिद्द

 सभ्यता को नष्ट करने की जिद्द पाले

वे लहराना चाहते हैं अपना झंडा

पहाड़ों पर

रेगिस्तानों में

समुद्रों में

जलडमरू मध्य में 

समुद्र की लहरों के नीचे

और आसमान में 

जो कि उनका है ही नहीं ! 


यह जो झंडा लहराना चाहते हैं

वह रंगा हुआ है 

बच्चो, महिलाओ के शोणित से 

झुलसा हुआ है 

स्कूलो, देवालयो  से धधकते  लपटों से 

फिर भी वे लहराना चाहते हैं अपना झंडा 

पहाड़ो पर, रेगिस्तान में, समन्दर में और आसमान पर !

वे घोषणा करते हैं कि उनका झंडा 

करता है प्रतिनिधित्व 

बुद्ध, मर्टिन लूथर किंग, गांधी और मंडेला का !


रविवार, 5 अप्रैल 2026

युद्ध में भूख

 जब दुनिया में चल रहा हो

युद्ध

भूख और प्यार का जिक्र करना है

देश को कमजोर करना ! 


जब आसमान में विचर रहे हों

बंबवर्षक विमान

खेतों में खड़ी फसल को बचाने की प्रार्थना करना है

देशद्रोह, जिसके लिए हो सकती है सजा भी !


सेना की भर्ती खुली है

बीच युद्ध के दौरान

और इसमें भर्ती होने से मना करना 

राष्ट्र के लिए कर्तव्य की अवहेलना है

जबकि रोजगार के अवसर भेंट चढ़ गए हैं

युद्ध के उन्माद के ! 


युद्ध लड़ती तो सेना है 

फिर भी इसके प्रभाव से कहां बचा रह सकता है

किसान, मजदूर, स्त्री और बच्चे ! 

शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2026

बसंत

1. 

जंगल काटकर  

बनाये जा रहे हैं राजमार्ग 

और भेजकर रंगबिरंगे सन्देश 

हम मना रहे हैं 

बसंत का उत्सव ! 


2


हमारी बालकनी में 

बसंत टंगा है 

और खेतों में पीली सरसों 

पड रही है पीली 

परदेशी पिया की प्रतीक्षा में ! 


3

झड़ने शुरू हो जायेंगे 

पत्ते 

फेंक दिए जायेंगे 

बुहार कर शहर के बाहर 

कूड़े के ढेर में 

मिटटी से मिलने की उनकी चाहत 

अधूरी रह जायेगी 

इस बार भी . 

गुरुवार, 1 जनवरी 2026

गज़ल : छुपी है धूप

छुपी है धूप है भर गया कोहरा

बिना ज़ुर्म के मैं बन गया मोहरा 


जिम्मेदरियों ने मुझे झुकाया इतना 

पीठ मेरा देखो, ऐसे हो गया दोहरा 


नाराज हो जब, नदी बहाती भी है 

जब भी धार पर लगाया गया पहरा 


पहचानना कठिन है इन दिनों 

किसने चेहरे पे है लगाया चेहरा 


धर्म जाति का शोर हुआ इतना 

न्याय औ' संविधान बन गया बहरा 


शनिवार, 27 दिसंबर 2025

सुबह मेरे जागने से पहले

 सुबह मेरे जागने से पहले

उठी होती है एक पूरी दुनियां

उठी होती वह स्त्री जो लगाने आती है

निगम की तरफ से मोहल्ले में झाड़ू लगाने, बिनने कूड़ा 

वह भी जाग चुका होता है

जो बांटने निकलता है दूध 

उसके पास पहले साइकिल हुआ करती है

जो अब मोटरसाइकिल हो गई है

फिर भी कहता है कि खुश नहीं है वह 


दूर कस्बे में स्कूल जाने वाले बच्चे और उनके पिता भी

जाग चुके होते हैं सूरज के जागने से पहले 

माएं बना चुकी होती है टिफिन झटपट

और झटपट ही बच्चियां भी रिबन बांध लेती हैं दो चोटियों में

बस्ता पीठ पर लाद बच्चे भाग रहे होते हैं 

सुनहरे भविष्य  की तरफ। 


खाली मैदान तो रहे नहीं अब कहीं भी

इंच इंच बिकने के बाद

इसलिए सड़कों पर दौड़ रहे हैं उत्साही युवा, अधेड़ और 

लपक कर चल रहे होते बूढ़े 

मेरे जागने से पहले सुबह सुबह। 


अब दुनियां सोती नहीं है

देश भी नहीं सोता है

दूसरे समय क्षेत्र की घड़ी से मिलान करते हुए

रातों को दिन सा व्यवहार करते हुए लोगों की

अलग ही दुनिया होती है और वे

लौट रहे होते हैं घरों को

जब मैं जागने को होता हूं सुबह सुबह। 


अब मुझे लगने लगा है कि 

रात अब नहीं रह गए हैं सोने के लिए

दिन अब नहीं रह गए हैं केवल काम के लिए

एक अजीब सी बेचैनी में जी रही होती है दुनियां

सुबह सुबह मेरे जागने से पहले ! 

मंगलवार, 23 दिसंबर 2025

ग़ज़ल

 किसी की खुशबू बसी है इस रुमाल में 

कायनात में किसी की बातें हैं कमाल में


वह दिखे तो और देखने का जी करता है

नहीं देखूं तो आ जाती है वह खयाल में


नाम उसका लेती हैं मेरी धड़कने भी अब

क्या बताऊं कि वह नहीं किसी मिसाल में


जुगनू सी चमकती है हंसी उसकी 

बना हूं गुलाम मैं उसके दुमाल में


धर्मों ने बांट दिए आवाम को अब 

अजान अब शोर है, रंग नहीं गुलाल में

मंगलवार, 16 दिसंबर 2025

साल की आखिरी कविता

साल की आखिरी कविता में 

 होना चाहिए इस बात का जिक्र कि 
साल के बदल जाने के बाद 
क्या क्या बदलेगा 
और क्या क्या रह जायेगा 
पहले जैसा?  

रोटी की गोलाई
बढ़ेगी या वह छोटी हो जाएगी 
पिछले साल की तुलना में 
इस बात का जिक्र जरूर होना चाहिए 
साल की आखिरी कविता में ! 

अँधेरा कितना कम  हुआ 
या कितना बढ़ा 
किसके हिस्से आये 
रोशनी के टुकड़े 
किसके कोने रह गए अँधेरे 
कितने हाथों को मिला काम 
कितने हाथ करते रहे इन्तजार  
शहर के लेबर चौक पर, 
इस बात का हिसाब किताब 
लगाता कोई अपनी कविता में 
तो कितना अच्छा होता ! 

कितने पेड़ कटे 
नदियों का जल कितना हुआ कम 
मछलियां कितनी घटी 
और कितना बढ़ा हवा में जहर 
नहीं मालूम कि  
ये सब बातें कविता के विषय हैं या नहीं 
नहीं भी हों तब भी क्या गलत है 
इन बातों का जिक्र 
साल की आखिरी कविता में ! 

गुरुवार, 13 नवंबर 2025

विनती

1.

वृक्ष ने विनती की है

उसके तने को मत काटो

उसके शाखाओं पर अभी 

कई चिड़ियों के घोंसले हैं। 

लेकिन कब सुनी गई है 

विनती वृक्षों की ! 


2.

बच्चों ने की है विनती

उन्हें रहने दो बच्चा ही

भेदभाव से परे

अपेक्षाओं और आकांक्षाओं से परे

लेकिन कब सुनी गई है 

विनती बच्चों की ! 


3.

कुओं ने की है विनती

उनकी गहराई को

मत पाटो 

खोल दो उनके सोते

रिसने दो पानी उनके भीतर

लेकिन कब सुनी गई है

विनती कुओं की ! 


4.

मैंने की एक विनती

मत छुड़ा कर जाओ मेरा हाथ

रुक जाओ चौखट पर

लेकिन तुमने कहा 

नदी कब रुकी है किनारों के लिए

कब सुनी गई है 

विनती किनारों की ! 


गुरुवार, 6 नवंबर 2025

प्रेम



1.
हवा
कब जाहिर करता है
अपना प्रेम! 

2.
पानी का प्रेम
तो  होता है 
रंगहीन स्वादहीन

3.
आकाश के प्रेम को
कब समेटा जा सकता है
बाहों में

4.
आग का प्रेम
जलाता नहीं 
पकाता है  ! 

5.
धरती का प्रेम
धैर्य में है
जो बंजर होने के बाद भी
अंकुरित होने की आशा
नहीं छोड़ती ! 

मंगलवार, 21 अक्टूबर 2025

Statement


Don't shrivel 

Crying in sorrow


Glancing mechanical humans 

Faithless and insensitive

Don't become stern 


Sad dreams force

Our ruined world

To think anew

To think afresh. 


The thorns of sorrow prick

To find a tender bud

Amidst all the thorns

So that the flowers of faith may blossom

In the gloomy chamber of the heart. 


Every sorrow 

Of the darkest night

Will seem like pleasant stars

If you can just read

The language of the eyes of the stars


Of the journey to the light

Mentioned is the description of 

Every deviation, twist and turn

Clear and Loud . 


(English translation of the poem "Bayan" of senior poet Shri Varun Kumar Tiwari by Arun Chandra Roy) 

शुक्रवार, 17 अक्टूबर 2025

गुरुवार, 16 अक्टूबर 2025

उदासी

गुरुवार, 4 सितंबर 2025

मृत्यु

स्पर्श

गन्ध

दृष्टि

रस 

चेतना  की समाप्ति

यदि मृत्यु है 

तो कितने ही लोग समझे जाएंगे 

मृत 

जबकि उनकी चल रही होती है 

उनकी श्वसन क्रिया ! 


मंगलवार, 26 अगस्त 2025

मृत्यु

1.

जीवन के बाद

एक नया जीवन है 

मृत्यु 


2.

लोभ, मोह 

माया से परे 

एक नया जीवन है 

मृत्यु 


3.

अपने पराए 

निकट दूर की आसक्ति से परे 

एक नया जीवन  है 

मृत्यु 


4.

राग द्वेष 

स्पृह से परे 

एक नया जीवन है 

मृत्यु 

गुरुवार, 21 अगस्त 2025

शव यात्रा

 

1.

मैं अक्सर शामिल हो जाता हूँ 

शवयात्रा में 

चाहे बुलाया गया हो या नहीं 

केवल इस लोभ में कि

मेरे शव के साथ भी खड़े होने 

दस बीस लोग !


2.


मैं आते जाते 

परिचित अपरिचित 

धर्म जाति के भेद से परे जाकर 

किसी भी शवयात्रा में 

चल पड़ता हूँ 

कई बार अपना जरूरी काम छोडकर भी 

और ज़ोर ज़ोर से चिल्लाता हूँ 

'राम नाम सत है , सबकी यही गत है'

ताकि मेरे भीतर के अहंकार की लहक पर 

पड़े थोड़ा पानी 

जैसे नहलाया जाता है मृत शरीर 

किन्तु कहाँ मरता है मेरा अहंकार अब भी ! 


3.


शव-यात्रा में  

अब सुबुकते, मौन, 

सदमे में थमी आँखों वाले 

परिवारजन, रिश्तेदार, दोस्त आदि 

कम ही दिखते हैं !