शनिवार, 12 जून 2010

तुम्हारा व्रत

(आज देश के बड़े हिस्से में वटसावित्री का त्यौहार मनाया जा रहा है। इसी सन्दर्भ में यह कविता )

तुमने
आज रखा व्रत
मुझे यमराज से
लौटा लाने के
हौसले के साथ
पूजा की
वट वृक्ष की

मेरे दीर्घायु होने की
कामना के साथ

भर ली
तुमने अपनी मांग
शाश्वत सिन्दूर से
लगा ली
बड़ी गोल बिंदी
और छुपा ली
बिंदी के नीचे का दाग

अपनी कामना को
बना लिया
तुमने जीवन का संबल
लेकिन
कहाँ बना पाया
मैं
तुम्हे एवं
तुम्हारे व्रत को
अपने मन का
आधार

11 टिप्‍पणियां:

  1. आधार बनेगा एक दिन
    सुन्दर प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  2. ऐसी कवितायेँ ही मन में उतरती हैं ॥

    उत्तर देंहटाएं
  3. आईये जानें .... क्या हम मन के गुलाम हैं!

    उत्तर देंहटाएं
  4. अपनी कामना को
    बना लिया
    तुमने जीवन का संबल
    लेकिन
    कहाँ बना पाया
    मैं
    तुम्हे एवं
    तुम्हारे व्रत को
    अपने मन का
    आधार
    gr8

    उत्तर देंहटाएं
  5. behad samvedansheel kavita.astha ka aik roop liye yah kavita wakai lajawab hai.

    उत्तर देंहटाएं