मंगलवार, 15 जून 2010

आंच

सही आंच पर
पकती है
रोटी नरम
और स्वादिष्ट
बताया था तुमने
जब खो रहा था
मैं
अपना धैर्य


जब तक
चूल्हे में रहती है
आंच
रहती है
मर्यादित


रिश्तों को
सहेजने के लिए भी
चाहिए
भावों की
सही आंच
समय समय पर


आंच
कई बार
शीतल होती है
जैसे
तुम्हारे
आँचल की आंच
जिसने
अपनी नरमाहट से
दिया ए़क नया जीवन

7 टिप्‍पणियां:

  1. रिश्तों को
    सहेजने के लिए भी
    चाहिए
    भावों की
    सही आंच
    समय समय पर...

    jazbaton ka sailab umad pada hai iss rachna mai... sehaj aur akarshak...

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  2. बहुत ही भावपूर्ण निशब्द कर देने वाली रचना . गहरे भाव.

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