रविवार, 20 जून 2010

बहुत याद आते हैं बाबूजी

बहुत याद आती है
कच्चे बांस की
पतली छड़ी
और अपनी पीठ पर
उधडे उनके निशान
जब
अपने बेटे को
ईडिएट बाक्स के आगे से
उठाने में रहता हूँ
असफल

अनुशासन की
पहली सीख
उसी छड़ी ने
थी सिखाई
और आज भी साथ है
पिताजी के
नहीं रहने पर भी

बहुत याद आती है
पिताजी का
मुहं अँधेरे उठाना
और उठाना
जब
नहीं उठा पाता हूँ
अपनी बिटिया को
जो कल रात देर से लौटी
किसी पार्टी से
और
आज भी सूरज
नारंगी दीखता है सुबह सुबह
नहीं पता
मेरे बच्चों को

नहीं कहा कभी
मैंने अपने बाबूजी को
हैप्पी फादर्स डे
लेकिन
बहुत याद आते हैं
बाबूजी
प्रायः रोज ही
और
अनायास ही
धन्यवाद में
उठ जाते हैं हाथ
ईश्वर की ओर

15 टिप्‍पणियां:

  1. मौज़ू कविता।
    पीढि़यों से पीढि़यों तक फासले बढ़ते रहे
    रह गया पीछे बहुत कुछ, और हम चलते रहे।

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  2. लिखने की कोई हद होती है. कितना उतर कर लिखते हो.मान गए. दो ज़माने की बात करते करते बहुत गहरी बात कर देते हो.
    सादर,

    माणिक

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  3. संवेदनशील .. सच में वो अनुशासन आज देखने को नही मिलता .. मानवी रिश्तों में वो महक सताती है ... बहुत अच्छा लिखा है ...

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  4. गजब!! मानो अपनी गाथा पढ़ रहे हों...शानदार!!

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  5. bahut jyada khubsurat..mujhe apni ek kshanika yaad aa gayi....

    ताकि पर सकें मेरे,
    बेरोकटोक निवाले.
    मेरे पिता ने उगा लिए,
    हाथ ना जाने कितने छाले.
    मैंने दूर के मंदिरों में,
    जाना छोड़ दिया है.

    naman apki lekhni ko, aisa likhne ke liye

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  6. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति....और सटीक भी

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  7. आप को पितृ दिवस की हार्दिक शुभकामनाऎँ !!

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  8. बहुत याद आते हैं बाबूजी .. सच में वह सरल और मुक्त अनुशासन अब कहाँ !!! अब कभी कभी तो संस्कार बेबस लगते हैं .सुन्दर कविता के लिए बधाई !

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  9. क्या कहें अब आज के इस चलन को, बस ऑंखें भर आयीं. इतनी कम पंक्तियों में एक लम्बी दास्ताँ वाह वाह !!!!

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  10. mujhe bhi mere papa bahut yaad aate hain...janamdin per ek pyaara sa gulab dete hue

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  11. बहुत याद आते हैं
    बाबूजी
    प्रायः रोज ही
    और
    अनायास ही
    धन्यवाद में
    उठ जाते हैं हाथ
    ईश्वर की ओर
    I lost my father in 2001 and do remember him a lot... thanks for enlightening the good childhood days...

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