गुरुवार, 17 जून 2010

तुम्हारे कदम

पड़े जो
तुम्हारे कदम
मेरे आँगन में
फुदुकने लगी
सैकड़ो गौरैया और
कागा करने लगा
शोर

कोयल कूक कूक कर
बताने लगी
आम की बगिया को कि
बहार आयी हैं
मेरे आँगन
अमरुद की डाली
झुक गयी
तेरे क़दमों में और
रख दिया अपने फल
समर्पण के भाव से

खिड़कियाँ
खिलखिला उठी
और दरवाजे
हाथ जोड़
खड़े हो गए

दीवारों ने
शुरू कर दिया
मुस्कुराना और
खड़े कर दिए
अपने कान
सुनने को तुम्हारी
खनकती हंसी

तुलसी के पत्ते
लगे महकने
और
समा गए तुममे
और
लाल टुह टुह
उड्हुल
अपने रंग को
भर दिया
तेरी मांग में
और
पहले से कहीं अधिक
प्रिय लगने लगी थी
तुम

पड़े जो
तुम्हारे कदम
मेरे आँगन
मन मेरा
बन गया मंदिर
और
तुम उसके
ईश्वर

(यह कविता मैं ने अपनी पत्नी के लिए लिखी थी जब पहली बार मेरे संग मेरे आँगन आयी थी वह। उसे पुनः समर्पित )

14 टिप्‍पणियां:

  1. श्रद्धा है इस प्यार में, और यही मजबूत विश्वास है

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  2. आप प्राकृतिक बिम्बो का सुन्दर प्रयोग करते है.
    सुखद है आपकी रचनाओ को पढना
    बहुत सुन्दर रचना

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  3. aangan me pada har kadam aapke dil ke ander aur ander le chala,ye ahsas har shabd me samaya hai....badiya rachna....

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  4. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  5. आपकी इस कविता ने मुझे मेरा एक गीत याद दिला दिया:

    गोरी इस अंगना में जब से तू आई है

    कैसी भी पवन चले, लगती पुरवाई है।

    बहुत अच्‍छे भाव लिये हैं आपने कविता में। आज एक अससम़ंजस की स्थिति भी देर हो गयी, रोज आपसे एक नई कविता प्राप्‍त होने पर मैं सोचता था कि भाई क्‍या गति है कविता लिखने की।
    आज कुछ परदे हटे
    धुँध के बादल छटे।

    शाम को देखा उन्‍हें
    रात अब कैसे कटे।

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  6. BHAI ARUN JI,
    MAIN AAP KE BLOG PAR NIYMIT AATA HUN ! PADHTA HUN .AAP BAHUT HI ACHHA LIKH RAHE HAIN .UPARYUKT KAVITA BAHUT SHANDAR HAI.
    BADHAI HO !

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  7. मन के भावोंको बहुत सुन्दर शब्द दिए हैं...

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  8. nice use of domestic imagery,nice placement of emotions in words.Nicely communicated.Beautiful poem of love.

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  9. कोयल कूक कूक कर
    बताने लगी
    आम की बगिया को कि
    बहार आयी हैं
    मेरे आँगन
    अमरुद की डाली
    झुक गयी
    तेरे क़दमों में और
    रख दिया अपने फल


    बहुत ही सुंदर .... एक एक पंक्तियों ने मन को छू लिया ...

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  10. मंगलवार 22- 06- 2010 को आपकी रचना ... चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर ली गयी है


    http://charchamanch.blogspot.com/

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  11. दीवारों ने
    शुरू कर दिया
    मुस्कुराना और
    खड़े कर दिए
    अपने कान
    सुनने को तुम्हारी
    खनकती हंसी
    कविता तो बहुत अच्छी है पर पहली बार पत्नी को ले कर आये हो और "दीवारों ने कान खड़े कर दिए" ये अच्छी बात नहीं है.इस पर एक शेर सुनाती हूँ
    "खामोश !!!
    दीवारों के भी कान होते हैं
    दरवाज़े मेहमान होते हैं
    खिड़कियाँ तो यूँ हीं बदनाम होती हैं
    मुखबिर तो रौशनदान होते हैं"

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