शुक्रवार, 18 जून 2010

भूख


कई प्रकार की
होती हैं
भूख और
कई आकार की भी
होती हैं
जैसे कहीं
आसमान के वितान सा
विस्तृत भूख
तो कहीं संतोष के भाव सा
लघु भूख

भूख के
रंग भी हैं
कई और
कई अर्थ भी
होते हैं
बदलते हुए स्थान और भाव के साथ
बदल जाते हैं
भूख के मायने

भूख का
इन्द्रधनुष
बीच दोपहरी में दीखता है
कभी
खेतों में
खलिहानों में
बस अड्डों पर
रेलवे स्टेशन पर
मेट्रो शहरों की लाल बत्ती पर
पसारे हुए हाथ

भूख
अपनी पूरी रंगीनियत में
है होती
जब वह होती है
पांच सितारा होटलों की लाबी में
कारपोरेट के बोर्ड रूम में
स्टॉक एक्सचेंज की रैलियों में

भूख का विज्ञान
अलग होता है
और
पृथक होता है
भूख का भूगोल

भूख
विस्तार लिए हुई है
कारखानों में दम फुलाते
मजदूरों से लेकर
स्वयं से समझौता करती
बालाओं तक

यही भूख
प्रयोगशालाओं में
सृजित कर रही है
जिंदगी
तो यही भूख
बेबस कर रही है
पेड़ पौधों और जंगलों को

आखों की भूख
पेट की भूख से
होती है विलग
और
देह की भूख
पर भारी पड़ती है
सपनो की भूख

और
ए़क अजीब सी भूख है यह
जब कहता हूँ मैं
तुमसे,
'सदियों से
भूखा हूँ मैं
तुम्हारी ए़क हंसी के लिए '

17 टिप्‍पणियां:

  1. सदियों से
    भूखा हूँ मैं
    तुम्हारी ए़क हंसी के लिए

    :)
    meethi bhookh

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  2. BHOOKH ka aisa chitran!! jo har pankti pe dhyan dene ko majboor karta hai.............ek prashanshniya rachna!!

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  3. और
    ए़क अजीब सी भूख है यह
    जब कहता हूँ मैं
    तुमसे,
    'सदियों से
    भूखा हूँ मैं
    तुम्हारी ए़क हंसी के लिए '
    .... वाह !!!!!!!!! क्या बात है !

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  4. क्या कहूँ …………किन लफ़्ज़ों मे प्रशंसा करूँ………………भूख के ना जाने कितने ही आयामों से रु-ब-रु करा दिया और हर आयाम एक अपनी ही कहानी कहता है…………………गज़ब की दूरदृष्टि।

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  5. तुमसे,
    'सदियों से
    भूखा हूँ मैं
    तुम्हारी ए़क हंसी के लिए '

    भूख यह भी है और भूख वह भी है
    सुन्दर रचना

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  6. आपकी इस कविता में निराधार स्वप्नशीलता और हवाई उत्साह न होकर सामाजिक बेचैनियां और सामाजिक वर्चस्वों के प्रति गुस्सा, क्षोभ और असहमति का इज़हार बड़ी सशक्तता के साथ प्रकट होता है।

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  7. भूख के माध्यम से बहुतसी बातों को कहा है ..सुन्दर प्रस्तुति

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  8. आखों की भूख
    पेट की भूख से
    होती है विलग
    और
    सपनो की भूख
    भारी होती है
    देह की भूख से.....nihshabd prashansa

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  9. ..भूख का
    इन्द्रधनुष
    बीच दोपहरी में दीखता है...
    ...वाह!

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  10. बदलते हुए स्थान और भाव के साथ
    बदल जाते हैं
    भूख के मायने
    बहुत सुन्दर कविता है अरुण जी.

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  11. और
    ए़क अजीब सी भूख है यह
    जब कहता हूँ मैं
    तुमसे,
    'सदियों से
    भूखा हूँ मैं
    तुम्हारी ए़क हंसी के लिए ..

    मुझे लगा थे भूख तो बस भूख ही होती है ... पर आपने तो नये आयाम खोल दिए हैं .... ग़ज़ब की रचना ...

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  12. arun ji,
    insaan aur bhookh ka ajab rishta hai, isi bhookh ke liye hum jite aur yahi bhookh hamein barbaad bhi karti, par bina bhookh hum ji bhi nahi skate. bhookh kabhi jine ki umang jagati to kabhi jiwan se palayan bhi karwati. bhookh se jude sabhi pahloo ko aapne bakhoobi ujaagar kiya hai, par sabse badi bhookh hai...

    और
    ए़क अजीब सी भूख है यह
    जब कहता हूँ मैं
    तुमसे,
    'सदियों से
    भूखा हूँ मैं
    तुम्हारी ए़क हंसी के लिए '

    ye jine ki shart to nahin par is bhookh se aatma tript hoti. bahut pyaari bhookh hai ye jo antim band mein aapne kaha hai, bahut badhai aapko.

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  13. आदरणीय अरुणजी
    भूख के विभिन्न प्रकार व्याखायित करते हुए अच्छी कविता लिखी है । और भी अनेक रूप हैं भूख के…
    सूत्रवाक्य की भांति बहुत प्रिय लगा

    सदियों से
    भूखा हूँ मैं
    तुम्हारी ए़क हंसी के लिए

    - राजेन्द्र स्वर्णकार
    शस्वरं

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  14. भूख यह भी है और भूख वह भी है
    सुन्दर रचना

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  15. वाह !!!!!क्या भूख है आपकी और उसके ऊपर आपकी भूख की विवेचना. हर बात में वज़न हर बात में भाव, एक सन्देश और ढेर सारी संवेदना सचमुच लाजवाव और अंतिम पंक्तियाँ तो मर मिटने के लिए पर्याप्त हैं !!!!!!!.
    कौन है ये खुशनसीब ?????

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  16. अरुण बाबू,
    जीवन के बहुत सारे पहलुओं को समटते हुए आपने जो इस कविता में रचा है. बड़ा कमाल लिए हुए है.

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