बुधवार, 16 जून 2010

मैं

यह शब्द
है सबसे छोटा
लेकिन
सबसे
व्यापक,
यह है
'मैं '

इस मैं ने
जहाँ
बनाया है
दुनिया को
बेहद खूबसूरत
वही
बदरंग भी हुई है
अपनी दुनिया
इसी मैं की
जिद्द में

युद्ध के बीज
इसी मैं ने
बोये हैं जहाँ
वही मैं ने
दिया है
शांति का सन्देश भी

मैं ने
ए़क ओर पैदा किया है
द्वेष और हिंसा
वहीँ
प्रेम का सन्देश दे
समर्पित भी हुए हैं
मैं


मैं
समा जाना चाहता हूँ
तुम्हारे मैं में
कि बन जाएँ
हम

12 टिप्‍पणियां:

  1. Behad sundar! Yahi "mai" jab 'aham'ban jata hai to mati bhrasht ho jati hai!

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  2. 'मैं' ने ही तो की थी शरारत
    'मैं' ने ही तो रची महाभारत
    इस मैं ने तो न जाने क्या क्या करवाया

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  3. नमस्ते,

    आपका बलोग पढकर अच्चा लगा । आपके चिट्ठों को इंडलि में शामिल करने से अन्य कयी चिट्ठाकारों के सम्पर्क में आने की सम्भावना ज़्यादा हैं । एक बार इंडलि देखने से आपको भी यकीन हो जायेगा ।

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  4. sahi kaha ye mein kya kya nahi karati...jo na hona ho iske karan ho jata hai

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  5. मै को लेकर खूबसूरत भाव दिए आपने .बधाई

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  6. सही कहा आपने "मैं" ही तो सारे फसादों की जड़ है - बहुत सुंदर

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  7. बहुत बढ़िया...इस मैं के कारण ही तो इतने फसाद होते हैं

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  8. मैं
    समां जाना चाहता हूँ
    तुम्हारे मैं में
    कि बन जाये
    अपनी दुनिया
    सबसे खूबसूरत
    mai ke kai roop ujagar karti ek umda rachna..

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  9. मैं तो केन्द्र है.मैं से वास्तविक प्यार करना समस्त कायनात से प्रेम करना है .जिसने मैं को समष्टिगत कर लिया -फिर कुछ करने को बचता ही कहाँ है .बढ़िया कविता है .

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  10. मै को लेकर खूबसूरत भाव.

    ...बढ़िया कविता है

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